बड़े घर की बेटी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी भाग-2 | Munshi Premchand Story in Hindi part-2
नमस्कार, दोस्तों मै इस article में मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) द्वारा रचित बड़े घर की बेटी कहानी भाग-1 (Bade Ghar Ki Beti Story *1) दी गयी है. (Bade Ghar Ki Beti – Munshi Premchand Story in Hindi) की कहानी भाग-2 में जरी है
श्रीकंठ-मैं जानता हूँ, तुम्हारी कृपा से यह मूर्ख नहीं है। आप स्वयं जानते हैं कि मेरे ही समझने-बुझाने से, इस गॉन्व में कई घर सांसभल, पर वह स्त्री की मान-प्रतिष्ठा का ईश्वर के दरबार में उत्तरदाता, उसकी प्रतिलिपि घोर अन्याय और पशुवत व्यवहार मुझे असहज है। आप सच मानिए, मेरे लिए यह कुछ कम नहीं है कि लालबिहारी को कुछ दंड नहीं होता है।
अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाये। ऐसी बातें और न सुनें। बोले-लालबिहारी तुम्हारा भाई है। जब कभी भूल जाते हैं, उसके कान पकड़ो लेकिन।
श्रीकंठ-लालबिहारी को मैं अब अपना भाई नहीं समझता हूं।
बेनीमाधव सिंह-स्त्री के पीछे?
श्रीकंठ-जी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण।
कुछ कुछ देर चुप रहना। ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे, लेकिन यह स्वीकार नहीं किया था कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है। यहां पर बीच में गॉन्व के और कई सज्जन हुक्के-चिलम के बहाने आओं आ बैठे। कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ पत्नी के पीछे पिता से लड़ने की तैयार हैं, तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। दोनों पक्षों की मधुर विधियां सुनने के लिए उनके आत्मा आत्मां तिलमिलाने लगीं। गॉन्व में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे, जो इस कुल की नीतिपूर्ण गति पर मन ही मन जलते थे। वे कहा करते थे-श्रीकंठ अपने बाप से दबता है, इसीलिए वह दब्ब है। वह विद्या पढ़ी, तो किताबों की कीड़ा है। बेनीमाधव सिंह उसकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते, यह उनकी मूर्खता है। इन महानुभावों की शुभकामनाएं आज पूरी तरह से दिखाया दीं। कोई हुक्का पीने के बहाने और कोई लगान की रसीद दिखा आ कर बैठे। बेनीमाधव सिंह बूढ़े आदमी थे। इन भावों को ताड़ चिन्ह। उन्होंने निश्चय किया कुछ भी क्यों नहीं हो, इन द्रोहियों को ताली बजाने का अवसर न दूँगा। तुरंत कोमल शब्द में बोले-बेटा, मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ। तम्हारा जो जी कब करो, अब तो लड़के से अपराध हो गया है।
इलाहाबाद का अनुभव-रहित झल्लाया हुआ ग्रेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे डिबेटिंग-क्लब में अपनी बात पर अड़ने की आदत थी, इन हथियारों की उसे क्या खबर? बाप ने जो अर्थ से बात पल्टी था, उसकी समझ में नहीं आया। कांग्रेस-लालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता है।
बेनीमाधव-बेटा, बुद्धिमान लोग मूर्खों की बात पर ध्यान नहीं देते हैं। वह बेस्मिज़ लड़का है। उससे जो कुछ भूल गया, उसे तुम बड़े होकर करो।
श्रीकंठ-उसकी इस बुराता को मैं कद नहीं नहीं कर सकता। या तो वही घर में रहनेगा, या मैं भी। आप अगर वह अधिक प्यारा है, तो मुझे विदा कीजिए, मैं अपना खुद का भार आप सैंडर्स लूँगा। अगर मुझे रखना है तो फिर से पहिया, जहरीले जा जाये। बस यह मेरा आखिरी निश्चय है।
लालबिहारी सिंह दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था। वह उनका बहुत सम्मान करता था। उसे कभी इतना साहस न हुआ था कि श्रीकंठ के सामने के चारों ओर बैठे जाये, हुक्का पी ले या पान खा ले। बाप का भी वह सब मान नहीं था। श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिक स्नेह था। अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़काया तक नहीं था। जब वह इलाहाबाद से आते हैं, तो उसके लिए कोई नहीं कोई वस्तु अवश्य लाते हैं। मुगदर की जोड़ी ने ही बनवा दी था। पिछले साल जब उसने खुद से ड्यौढ़े जवान को नागपंचमी के दिन दंगल में पछाड़ दिया, तो उन्होंने पुलकित होकर अखाड़े में ही जा कर उसे गले लगा लिया था, पॉंच के पैसे लुटाये थे। ऐसे भाई के मुंह से आज जैसी हृदय-विदारक बात सुनकर लालबिहारी को बड़ा ग्लानि हुई। वह फूट-फूट कर रोने लगा। इसमें संदेह नहीं है कि स्वयं पर पछता रहा था। भाई के आने से एक दिन पहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखूँ भैया क्या कहते हैं। मैं उनके सम्मुख कैसे हूं, उनसे बोलूँगा, मेरी आंखें उनके सामने कैसे उठेगी। वह समझा था कि भैया मुझे बुलाकर समझा काम। इस आशा के विपरीत आज वह उन्हें निर्दयता की मूर्ति बना पाया। वह मूर्ख था। लेकिन उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। अगर श्रीकंठ उसे अकेले में बुलाकर दो-चार बातें कहते हैं; इतना ही नहीं दो-चार तमाचे भी लगा दिया तो उसे तो उसे इतना दु: ख नहीं होता; पर भाई का यह कहना है कि अब मैं उसे सूरत नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से नहीं मिला! वह रोता हुआ घर आया। कोठारी में जा कर कपड़े पहने, ओखें पोंछी, इसमें कोई भी नहीं समझा कि रोता था। तब के द्वार पर आकर मान-भाभी, भैया ने निश्चय किया है कि मेरे साथ इस घर में न रहेंगे। अब वह मेरा मुंह नहीं देखना; तो अब मैं जाता हूँ। फिर फिर मुँह न दिखाऊंगा! क्या आप कुछ करना चाहते हैं, उसे करना चाहते हैं।
यह कहते हैं-कहते हैं लालबिहारी का गला भरें।
वह समय लालबिहारी सिंह सिर झुकाये प्रशासन के द्वार पर खड़ था, उसी समय श्रीकांत सिंह भी ऑखें लाल बाहर बाहर आये। भाई को खड़ा देखा, तो घृणा से ऑखें फेर लीं, और कतर कर निकल ने कहा। मानों पर परछी से दूर भागते हैं।
ज्ञान ने लालबिहारी की शिकायत तो की थी, लेकिन अब मन में पछता रही था वह स्वभाव से ही दयावती थी। उसे उसका तनिक भी ध्यान न था कि बात इनी बढ़ जायेगी। वह मन में अपने पति पर झुंझला रहा था कि यह बहुत गर्म क्यों हो रहा है। उस पर यह भी लगा हुआ था कि कहीं भी इलाहाबाद चलने को कहें, तो कैसे करुणगी। इस बीच में जब वह लालबिहारी को दरवाजा पर खड़े यह कहता है कि अब मैं जाता हूं, मैं जो कुछ करता हूं, सोच रहा हूं, तो उसके साथ-साथ क्रोध भी पानी हो गया। वह रोने लगी। मन का मैल धोने के लिए नयन-जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है।
श्रीकंठ को देखकर ने कहा-लाला बाहर खड़े बहुत रो रहे हैं।
श्रीकंठ-तो मैं क्या करूँ?
बीच-अंदर बुला लो। मेरी जीभ में आग लग गई! मैं कहोँ से यह झगड़ा उठाया।
श्रीकंठ-मैं न बुलाऊंगा।
आनंदी-पछताओगे। उन्हें बहुत ग्लानि हो गया है, ऐसा नहीं हो, कहीं चलना।
श्रीकांत न उठे। केवल एक में लालबिहारी ने फिर कहा-भाभी, भैया से मेरा सलाम कह दो। वह मेरा मुंह नहीं देखना; मैं भी अपना मुंह उन्हें न दिखाऊंगा।
लालबिहारी इतने कह कर लौट था, और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ाया। अंत में संशोधित कमरे से निकली और उसके हाथ पकड़ लिया। लालबिहारी ने पीछे फिर कर देखा और ओखों में ओंसू भरे-मुझे जाने दो।
स्वीकार कहां जाना हो?
लालबिहारी-जहोन कोई मेरा मुंह न देखे।
क्या-मैं न जाने दूँगी?
लालबिहारी- मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।
आप-मेरी मेरी सौगंध अब एक पग भी आगे न बढ़ाना।
लालबिहारी-जब तक मुझे यह नहीं पता हो जाये कि भैया का मन मेरी तरफ से साफ़ हो गया, तब तक मैं इस घर में कद नहीं न रहूँगा।
भाषा-मैं ईश्वर को साक्षी दे कर कहती हूं कि तुम्हारी ओर से मेरे मन में तनिक भी मैल नहीं है।
अब श्रीकांत का दिल भी पिघला। उसने बाहर आकर लालबिहारी को गले लगा लिया। इन भाई खूब फूट-फूट कर रोए। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा-भैया, अब कभी मत कहो कि तुम्हारा मुंह न देखूँगा। इसके सिवा आप जो दंड काम, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा।
श्रीकन्ठ ने कोंपते हुए स्वर में कहा-लल्लू! इन बातों को बिल्कुल भूल जाओ जाओ। ईश्वर रास्ता, फिर फिर से हमलों नवेगा।
बेनीमाधव सिंह बाहर से आ रहे थे। सभी भाइयों को गले मिलते देखकर आनंद से पुलकित हो गया। बोल उठे-बड़े घर की बेटीओन जैसी होती है। बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं।
गॉन्व में जोने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में प्रवेश की उदारता को सराहा-'बड़े घर की बेटियों जैसी ही होती है। '
श्रीकंठ-मैं जानता हूँ, तुम्हारी कृपा से यह मूर्ख नहीं है। आप स्वयं जानते हैं कि मेरे ही समझने-बुझाने से, इस गॉन्व में कई घर सांसभल, पर वह स्त्री की मान-प्रतिष्ठा का ईश्वर के दरबार में उत्तरदाता, उसकी प्रतिलिपि घोर अन्याय और पशुवत व्यवहार मुझे असहज है। आप सच मानिए, मेरे लिए यह कुछ कम नहीं है कि लालबिहारी को कुछ दंड नहीं होता है।
अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाये। ऐसी बातें और न सुनें। बोले-लालबिहारी तुम्हारा भाई है। जब कभी भूल जाते हैं, उसके कान पकड़ो लेकिन।
श्रीकंठ-लालबिहारी को मैं अब अपना भाई नहीं समझता हूं।
बेनीमाधव सिंह-स्त्री के पीछे?
श्रीकंठ-जी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण।
कुछ कुछ देर चुप रहना। ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे, लेकिन यह स्वीकार नहीं किया था कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है। यहां पर बीच में गॉन्व के और कई सज्जन हुक्के-चिलम के बहाने आओं आ बैठे। कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ पत्नी के पीछे पिता से लड़ने की तैयार हैं, तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। दोनों पक्षों की मधुर विधियां सुनने के लिए उनके आत्मा आत्मां तिलमिलाने लगीं। गॉन्व में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे, जो इस कुल की नीतिपूर्ण गति पर मन ही मन जलते थे। वे कहा करते थे-श्रीकंठ अपने बाप से दबता है, इसीलिए वह दब्ब है। वह विद्या पढ़ी, तो किताबों की कीड़ा है। बेनीमाधव सिंह उसकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते, यह उनकी मूर्खता है। इन महानुभावों की शुभकामनाएं आज पूरी तरह से दिखाया दीं। कोई हुक्का पीने के बहाने और कोई लगान की रसीद दिखा आ कर बैठे। बेनीमाधव सिंह बूढ़े आदमी थे। इन भावों को ताड़ चिन्ह। उन्होंने निश्चय किया कुछ भी क्यों नहीं हो, इन द्रोहियों को ताली बजाने का अवसर न दूँगा। तुरंत कोमल शब्द में बोले-बेटा, मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ। तम्हारा जो जी कब करो, अब तो लड़के से अपराध हो गया है।
इलाहाबाद का अनुभव-रहित झल्लाया हुआ ग्रेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे डिबेटिंग-क्लब में अपनी बात पर अड़ने की आदत थी, इन हथियारों की उसे क्या खबर? बाप ने जो अर्थ से बात पल्टी था, उसकी समझ में नहीं आया। कांग्रेस-लालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता है।
बेनीमाधव-बेटा, बुद्धिमान लोग मूर्खों की बात पर ध्यान नहीं देते हैं। वह बेस्मिज़ लड़का है। उससे जो कुछ भूल गया, उसे तुम बड़े होकर करो।
श्रीकंठ-उसकी इस बुराता को मैं कद नहीं नहीं कर सकता। या तो वही घर में रहनेगा, या मैं भी। आप अगर वह अधिक प्यारा है, तो मुझे विदा कीजिए, मैं अपना खुद का भार आप सैंडर्स लूँगा। अगर मुझे रखना है तो फिर से पहिया, जहरीले जा जाये। बस यह मेरा आखिरी निश्चय है।
लालबिहारी सिंह दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था। वह उनका बहुत सम्मान करता था। उसे कभी इतना साहस न हुआ था कि श्रीकंठ के सामने के चारों ओर बैठे जाये, हुक्का पी ले या पान खा ले। बाप का भी वह सब मान नहीं था। श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिक स्नेह था। अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़काया तक नहीं था। जब वह इलाहाबाद से आते हैं, तो उसके लिए कोई नहीं कोई वस्तु अवश्य लाते हैं। मुगदर की जोड़ी ने ही बनवा दी था। पिछले साल जब उसने खुद से ड्यौढ़े जवान को नागपंचमी के दिन दंगल में पछाड़ दिया, तो उन्होंने पुलकित होकर अखाड़े में ही जा कर उसे गले लगा लिया था, पॉंच के पैसे लुटाये थे। ऐसे भाई के मुंह से आज जैसी हृदय-विदारक बात सुनकर लालबिहारी को बड़ा ग्लानि हुई। वह फूट-फूट कर रोने लगा। इसमें संदेह नहीं है कि स्वयं पर पछता रहा था। भाई के आने से एक दिन पहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखूँ भैया क्या कहते हैं। मैं उनके सम्मुख कैसे हूं, उनसे बोलूँगा, मेरी आंखें उनके सामने कैसे उठेगी। वह समझा था कि भैया मुझे बुलाकर समझा काम। इस आशा के विपरीत आज वह उन्हें निर्दयता की मूर्ति बना पाया। वह मूर्ख था। लेकिन उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। अगर श्रीकंठ उसे अकेले में बुलाकर दो-चार बातें कहते हैं; इतना ही नहीं दो-चार तमाचे भी लगा दिया तो उसे तो उसे इतना दु: ख नहीं होता; पर भाई का यह कहना है कि अब मैं उसे सूरत नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से नहीं मिला! वह रोता हुआ घर आया। कोठारी में जा कर कपड़े पहने, ओखें पोंछी, इसमें कोई भी नहीं समझा कि रोता था। तब के द्वार पर आकर मान-भाभी, भैया ने निश्चय किया है कि मेरे साथ इस घर में न रहेंगे। अब वह मेरा मुंह नहीं देखना; तो अब मैं जाता हूँ। फिर फिर मुँह न दिखाऊंगा! क्या आप कुछ करना चाहते हैं, उसे करना चाहते हैं।
यह कहते हैं-कहते हैं लालबिहारी का गला भरें।
वह समय लालबिहारी सिंह सिर झुकाये प्रशासन के द्वार पर खड़ था, उसी समय श्रीकांत सिंह भी ऑखें लाल बाहर बाहर आये। भाई को खड़ा देखा, तो घृणा से ऑखें फेर लीं, और कतर कर निकल ने कहा। मानों पर परछी से दूर भागते हैं।
ज्ञान ने लालबिहारी की शिकायत तो की थी, लेकिन अब मन में पछता रही था वह स्वभाव से ही दयावती थी। उसे उसका तनिक भी ध्यान न था कि बात इनी बढ़ जायेगी। वह मन में अपने पति पर झुंझला रहा था कि यह बहुत गर्म क्यों हो रहा है। उस पर यह भी लगा हुआ था कि कहीं भी इलाहाबाद चलने को कहें, तो कैसे करुणगी। इस बीच में जब वह लालबिहारी को दरवाजा पर खड़े यह कहता है कि अब मैं जाता हूं, मैं जो कुछ करता हूं, सोच रहा हूं, तो उसके साथ-साथ क्रोध भी पानी हो गया। वह रोने लगी। मन का मैल धोने के लिए नयन-जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है।
श्रीकंठ को देखकर ने कहा-लाला बाहर खड़े बहुत रो रहे हैं।
श्रीकंठ-तो मैं क्या करूँ?
बीच-अंदर बुला लो। मेरी जीभ में आग लग गई! मैं कहोँ से यह झगड़ा उठाया।
श्रीकंठ-मैं न बुलाऊंगा।
आनंदी-पछताओगे। उन्हें बहुत ग्लानि हो गया है, ऐसा नहीं हो, कहीं चलना।
श्रीकांत न उठे। केवल एक में लालबिहारी ने फिर कहा-भाभी, भैया से मेरा सलाम कह दो। वह मेरा मुंह नहीं देखना; मैं भी अपना मुंह उन्हें न दिखाऊंगा।
लालबिहारी इतने कह कर लौट था, और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ाया। अंत में संशोधित कमरे से निकली और उसके हाथ पकड़ लिया। लालबिहारी ने पीछे फिर कर देखा और ओखों में ओंसू भरे-मुझे जाने दो।
स्वीकार कहां जाना हो?
लालबिहारी-जहोन कोई मेरा मुंह न देखे।
क्या-मैं न जाने दूँगी?
लालबिहारी- मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।
आप-मेरी मेरी सौगंध अब एक पग भी आगे न बढ़ाना।
लालबिहारी-जब तक मुझे यह नहीं पता हो जाये कि भैया का मन मेरी तरफ से साफ़ हो गया, तब तक मैं इस घर में कद नहीं न रहूँगा।
भाषा-मैं ईश्वर को साक्षी दे कर कहती हूं कि तुम्हारी ओर से मेरे मन में तनिक भी मैल नहीं है।
अब श्रीकांत का दिल भी पिघला। उसने बाहर आकर लालबिहारी को गले लगा लिया। इन भाई खूब फूट-फूट कर रोए। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा-भैया, अब कभी मत कहो कि तुम्हारा मुंह न देखूँगा। इसके सिवा आप जो दंड काम, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा।
श्रीकन्ठ ने कोंपते हुए स्वर में कहा-लल्लू! इन बातों को बिल्कुल भूल जाओ जाओ। ईश्वर रास्ता, फिर फिर से हमलों नवेगा।
बेनीमाधव सिंह बाहर से आ रहे थे। सभी भाइयों को गले मिलते देखकर आनंद से पुलकित हो गया। बोल उठे-बड़े घर की बेटीओन जैसी होती है। बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं।
गॉन्व में जोने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में प्रवेश की उदारता को सराहा-'बड़े घर की बेटियों जैसी ही होती है। '

Comments
Post a Comment