सच्चाई का उपहार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी भाग -1
दोस्तों मै सच्चाई का उपहार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
तहसीली मदरसा बरांव के प्रथमा दशक मुंशी भवानीसहाय को बागवानी का कुछ व्यसन था। क्यारी में भाँति-भाँति के फूल और पत्तियां लगा रखी थीं। दरवाजे पर लताएं चढ़ा दी थां। इससे मदरसे की शोभा अधिक हो गया था। वह मिडिल कक्षा के लड़कों से भी अपने खुद के केंचन और साफ करने में मदद करते थे। अधिकांश लड़के इस काम को रुचि पूर्वक कर। इससे उनका मनोरंजन होता था किंतु दरजे में चार-पाँच लड़के जमींदारों के थे। घर में दुर्भाग्य था कि यह मनोरंजक कार्य भी उन्हें बेगार प्रतीत होता है। उन्होंने बाल्यकाल से आलस्य में जीवन व्यतीत किया था। अमीरी का झूठा अभिमान दिल में भरा हुआ था। वह हाथ से कोई काम करना निंदा की बात समझते थे। वे इस सेचेचे से घृणा था। जब उनके काम करने की बारी आती, तो कोई-न-कोई बहाना कर उड़ते हैं। इतना नहीं, दूसरे लड़के को बहकाते और कहो, वाह! पढ़ें फारसी, तेल डाउनलोड करें! अगर खुरपी-कुदाल ही करना है, तो मदरसे में किताबों से सिर मारने की क्या ज़रूरत है? यहाँ पढ़ने आते हैं, कुछ मजूरी नहीं आते हैं। मुंशीजी इस अवज्ञा के लिए उन्हें कभी-कभी दंड दे दिया थे। इससे उनका दूसरा और भी बढ़ता था। अंत में यहां तक नौबत पहुँची कि एक दिन उन लड़कों ने सलाह दी उस पुष्पवाटिका को विध्वंस करने का निश्चय किया।
दस बजे मदरसा लग रहा था, किन्तु उस दिन वह आठ बजे ही आयन और बजचे में घुसकर उसे उजाड़ने लगे। कहीं पौधे उखाड़ फेंके कहीं क्याियां रौंड डाला, पानी की नीलियां तोड़ डालीं, क्यारीज़ की मेड़ें खोद डाली। मरे भय की छाती धड़क रही थी कि कहीं कोई देखता नहीं हो। लेकिन एक छोटी सी फुलवाड़ी के उदयते कितनी देर लगती है? दस मिनट में हरा-भरा बाग नष्ट हो गया। तब यह लड़के शीघ्रता निकले, लेकिन दरवाजे तक मैं थे कि उनकी सहपाठी की सूरत दे दी। यह एक-दुबला-पतला, दरिद्र और चतुर लड़का था। उसका नाम बाजबहादुर था। बड़ा गम्भीर, शांत लड़का था। ऊधम पार्टी के लड़के से जलते थे। उसे देखकर उनका खून सूख गया। विश्वास हो गया कि इसने जरूर देख लिया। यह मुंशीजी से क बिना बिना रहेगा। बुरे फँसे। आज कुशल नहीं है। यह राक्षस इस समय यहां क्या करना था? आपस में इशारे हुए कि मिला लेना चाहिए। जगतसिंह उनके मुखिया था। आगे बढ़ने वाला आज-आज भी सबरेरे कैसे आ गया? हम तो आज आपलोगों के गले की फाँसी छुड़ा दी। लाला बहुत दिक किया कर थे, यह करो, वह करो। मगर यार देखो, कहीं मुंशीजी जड़ मत देना, नहीं तो लेने के देने पड़ो जायेंगे।
जयराम ने कहा-कह क्या प्यार, स्वयं ही हैं। हम जो कुछ किया है, वह सबके लिए किया है, केवल अपने ही भलाई के लिए नहीं। चलो यार, आप बाजार की सैर कर, मुंह मीठा धन्यवाद।
बाजबहादुर ने कहा-नहीं, मुझे आज घर पर पाठ याद करने का अवकाश नहीं मिला। यम बैठकर पढ़ना।
जगतसिंह-अच्छा, मुंशीजी से कहोगे तो न?
बाजबहादुर-मैं स्वयं कुछ न कहूँगा, लेकिन वे पूछते हैं?
जगतसिंह-कह देना, मुझे नहीं मालूम।
बाजबहादुर-यह झूठ से नंगे।
जयराम-अगर तुमने चुगली खाई और हमारे ऊपर मार पड़ी, तो हम आप पीटे बिना न छोड़ें।
बाजबहादुर-हमने कहा कि चुगली न खायंगे लेकिन मुंशीजी ने पूछा, तो झूठ भी न बोलेंगे।
जयराम-तो हम तुम्हारी हड्डी भीड़ड़ तोड़।
बाजबहादुर-इसका आप अधिकार है।
दस बजे जब मदरसा लगा और मुंशी भवानीसहाय ने बाग की यह दुर्दशा देखा तो क्रोध से आग हो गया। बाग उजड़ने का बहुत खेद नहीं था, जोना लड़कों की शरारत का। अगर किसी साँद ने यह तो वैध है, तो वह केवल हाथ मलकर रह गया। किट लड़कों के इस अत्याचार को सहन नहीं कर सकते हैं। जियोन ही लड़के दरजे में बैठे, वह तेवर बदले में आ गया और पूछा-यह बाग किसने उजाड़ा है?
कमरे में सन्नाटा छा गया। अपराधियों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं। मिडिल कक्षा के 25 शिक्षाएं कोई ऐसा नहीं था, जो इस घटना को न हो जाए किंतु किसी में यह साहस न था कि उठाने साफ-साफ़ कह दे। सबके-सब सिर झुकाए मौन धारण किए बैठे थे।
मुंशीजी का क्रोध और भी हुआ हुआ। चिल्लाकर बोले-मुझे विश्वास है कि यह तुम्हे लोगों में से किसी की शरारत है। ठीक माल हो, स्पष्ट कह दे, नहीं तो मैं एक सिरे से पीटना शुरू करूँगा, फिर कोई यह नहीं कहे कि हम निरपराध मारे गए।
एक लड़का भी नंद। वही सन्नाटा! मुंशीजी-देवीप्रसाद, तुम जानते हो?
देवी-जी नहीं, मुझे कुछ नहीं पता।
'शिवदत्त, तुम जानते हो?'
'जी नहीं, मुझे कुछ नहीं पता।'
'बाजबहादुर, तुम कभी झूठ नहीं बोलते, तुम क्या हो?'
बाजबहादुर खड़ा हो गया, उसके मुख-मंडल पर वीरता का प्रकाश था। नेत्रों में साहस झलक रहा था। कांग्रेस-जी हाँ!
मुंशीजी ने कहा-शाबाश!
अपराधियों ने तब बाजबहादुर की ओर रक्तचाप आँखों से देखा और मन में कहा-अच्छा!
भवानीसहाय बड़े धैर्यवान मनुष्य थे। वास्तविकशक्ति लड़कों को तोनाना नहीं देते थे, किन्तु जैसी बुराता का दंड देने में वह लेश-मात्र भी दया न दिखाते थे। छड़ी मँगाकर पाँचन्स अपराधियों को दस-दस छड़ियां लगाई जाती हैं, पूरे दिन बेंच पर खड़ा कदम और चाल-चलन के पंजीकरण में उनके नाम के सामने काले चिह्न बनाते हैं।
शेष अगले भाग में
तहसीली मदरसा बरांव के प्रथमा दशक मुंशी भवानीसहाय को बागवानी का कुछ व्यसन था। क्यारी में भाँति-भाँति के फूल और पत्तियां लगा रखी थीं। दरवाजे पर लताएं चढ़ा दी थां। इससे मदरसे की शोभा अधिक हो गया था। वह मिडिल कक्षा के लड़कों से भी अपने खुद के केंचन और साफ करने में मदद करते थे। अधिकांश लड़के इस काम को रुचि पूर्वक कर। इससे उनका मनोरंजन होता था किंतु दरजे में चार-पाँच लड़के जमींदारों के थे। घर में दुर्भाग्य था कि यह मनोरंजक कार्य भी उन्हें बेगार प्रतीत होता है। उन्होंने बाल्यकाल से आलस्य में जीवन व्यतीत किया था। अमीरी का झूठा अभिमान दिल में भरा हुआ था। वह हाथ से कोई काम करना निंदा की बात समझते थे। वे इस सेचेचे से घृणा था। जब उनके काम करने की बारी आती, तो कोई-न-कोई बहाना कर उड़ते हैं। इतना नहीं, दूसरे लड़के को बहकाते और कहो, वाह! पढ़ें फारसी, तेल डाउनलोड करें! अगर खुरपी-कुदाल ही करना है, तो मदरसे में किताबों से सिर मारने की क्या ज़रूरत है? यहाँ पढ़ने आते हैं, कुछ मजूरी नहीं आते हैं। मुंशीजी इस अवज्ञा के लिए उन्हें कभी-कभी दंड दे दिया थे। इससे उनका दूसरा और भी बढ़ता था। अंत में यहां तक नौबत पहुँची कि एक दिन उन लड़कों ने सलाह दी उस पुष्पवाटिका को विध्वंस करने का निश्चय किया।
दस बजे मदरसा लग रहा था, किन्तु उस दिन वह आठ बजे ही आयन और बजचे में घुसकर उसे उजाड़ने लगे। कहीं पौधे उखाड़ फेंके कहीं क्याियां रौंड डाला, पानी की नीलियां तोड़ डालीं, क्यारीज़ की मेड़ें खोद डाली। मरे भय की छाती धड़क रही थी कि कहीं कोई देखता नहीं हो। लेकिन एक छोटी सी फुलवाड़ी के उदयते कितनी देर लगती है? दस मिनट में हरा-भरा बाग नष्ट हो गया। तब यह लड़के शीघ्रता निकले, लेकिन दरवाजे तक मैं थे कि उनकी सहपाठी की सूरत दे दी। यह एक-दुबला-पतला, दरिद्र और चतुर लड़का था। उसका नाम बाजबहादुर था। बड़ा गम्भीर, शांत लड़का था। ऊधम पार्टी के लड़के से जलते थे। उसे देखकर उनका खून सूख गया। विश्वास हो गया कि इसने जरूर देख लिया। यह मुंशीजी से क बिना बिना रहेगा। बुरे फँसे। आज कुशल नहीं है। यह राक्षस इस समय यहां क्या करना था? आपस में इशारे हुए कि मिला लेना चाहिए। जगतसिंह उनके मुखिया था। आगे बढ़ने वाला आज-आज भी सबरेरे कैसे आ गया? हम तो आज आपलोगों के गले की फाँसी छुड़ा दी। लाला बहुत दिक किया कर थे, यह करो, वह करो। मगर यार देखो, कहीं मुंशीजी जड़ मत देना, नहीं तो लेने के देने पड़ो जायेंगे।
जयराम ने कहा-कह क्या प्यार, स्वयं ही हैं। हम जो कुछ किया है, वह सबके लिए किया है, केवल अपने ही भलाई के लिए नहीं। चलो यार, आप बाजार की सैर कर, मुंह मीठा धन्यवाद।
बाजबहादुर ने कहा-नहीं, मुझे आज घर पर पाठ याद करने का अवकाश नहीं मिला। यम बैठकर पढ़ना।
जगतसिंह-अच्छा, मुंशीजी से कहोगे तो न?
बाजबहादुर-मैं स्वयं कुछ न कहूँगा, लेकिन वे पूछते हैं?
जगतसिंह-कह देना, मुझे नहीं मालूम।
बाजबहादुर-यह झूठ से नंगे।
जयराम-अगर तुमने चुगली खाई और हमारे ऊपर मार पड़ी, तो हम आप पीटे बिना न छोड़ें।
बाजबहादुर-हमने कहा कि चुगली न खायंगे लेकिन मुंशीजी ने पूछा, तो झूठ भी न बोलेंगे।
जयराम-तो हम तुम्हारी हड्डी भीड़ड़ तोड़।
बाजबहादुर-इसका आप अधिकार है।
दस बजे जब मदरसा लगा और मुंशी भवानीसहाय ने बाग की यह दुर्दशा देखा तो क्रोध से आग हो गया। बाग उजड़ने का बहुत खेद नहीं था, जोना लड़कों की शरारत का। अगर किसी साँद ने यह तो वैध है, तो वह केवल हाथ मलकर रह गया। किट लड़कों के इस अत्याचार को सहन नहीं कर सकते हैं। जियोन ही लड़के दरजे में बैठे, वह तेवर बदले में आ गया और पूछा-यह बाग किसने उजाड़ा है?
कमरे में सन्नाटा छा गया। अपराधियों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं। मिडिल कक्षा के 25 शिक्षाएं कोई ऐसा नहीं था, जो इस घटना को न हो जाए किंतु किसी में यह साहस न था कि उठाने साफ-साफ़ कह दे। सबके-सब सिर झुकाए मौन धारण किए बैठे थे।
मुंशीजी का क्रोध और भी हुआ हुआ। चिल्लाकर बोले-मुझे विश्वास है कि यह तुम्हे लोगों में से किसी की शरारत है। ठीक माल हो, स्पष्ट कह दे, नहीं तो मैं एक सिरे से पीटना शुरू करूँगा, फिर कोई यह नहीं कहे कि हम निरपराध मारे गए।
एक लड़का भी नंद। वही सन्नाटा! मुंशीजी-देवीप्रसाद, तुम जानते हो?
देवी-जी नहीं, मुझे कुछ नहीं पता।
'शिवदत्त, तुम जानते हो?'
'जी नहीं, मुझे कुछ नहीं पता।'
'बाजबहादुर, तुम कभी झूठ नहीं बोलते, तुम क्या हो?'
बाजबहादुर खड़ा हो गया, उसके मुख-मंडल पर वीरता का प्रकाश था। नेत्रों में साहस झलक रहा था। कांग्रेस-जी हाँ!
मुंशीजी ने कहा-शाबाश!
अपराधियों ने तब बाजबहादुर की ओर रक्तचाप आँखों से देखा और मन में कहा-अच्छा!
भवानीसहाय बड़े धैर्यवान मनुष्य थे। वास्तविकशक्ति लड़कों को तोनाना नहीं देते थे, किन्तु जैसी बुराता का दंड देने में वह लेश-मात्र भी दया न दिखाते थे। छड़ी मँगाकर पाँचन्स अपराधियों को दस-दस छड़ियां लगाई जाती हैं, पूरे दिन बेंच पर खड़ा कदम और चाल-चलन के पंजीकरण में उनके नाम के सामने काले चिह्न बनाते हैं।
शेष अगले भाग में

Comments
Post a Comment