बड़े घर की बेटी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी-1 | Munshi Premchand Story in Hindi-1
नमस्कार, दोस्तों मैइस article में मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) द्वारा रचित बड़े घर की बेटी कहानी (Bade Ghar Ki Beti Story) दी गयी है. (Bade Ghar Ki Beti – Munshi Premchand Story in Hindi)
मुंशी प्रेमचंद की कहानी - बड़े घर की बेटी
बड़े घर की बेटी
बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गॉन्व के जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-लिंग संपन्न थे। गॉन्व का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल था, उन्माद कीर्ति-स्तंभ थे। कहां हैं इस दरवाजे पर हाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस था, जिसका शरीर में अस्थि-पंजर के सिवा और कुछ नहीं था; पर दूध शायद बहुत कुछ था; क्योंकि एक न एक आदमी हॉन्डी के लिए उसके सिर पर सवार ही रहता था। बेनीमाधव सिंह अपने आधे से अधिक संपत्ति के लिए किराए पर कर रहे थे। उनके वर्तमान आय एक हजार साल वार्षिक से अधिक नहीं था। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़ा का नाम श्रीकांत सिंह था। उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी.ए. की डिग्री प्राप्त की थी। अब एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लाल-बिहारी सिंह दोहरे बदन का, सजीला जवान था। भरा हुआ मुखड़ा, चौड़ी छाती। भैंस का दो सेर ताजा दूध वह उठ कर सबरे पीस था। श्रीकांत सिंह की दशा बिलकुल विपरीत था। इन नेत्ररी गुणों को बी बी 0 ए 0-इन्क दो अक्षरों पर न्योछढ़ कर दिया गया था। इन दो अक्षरों ने उनके शरीर को निर्बल और चेहरे को कांतिहीन बना दिया था। यहां से वैद्यक ग्रंथों पर उनका विशेष प्रेम था। आयुर्वेदिक औषधि पर उनके अधिक विश्वास था। शाम-सबरेरे उनके कमरे से प्रायः खरल की सुरीली कर्णमधुर ध्वनि सुनाई दी गई थी। लाहौर और कलकत्ता के वैद्यों से बड़ा लिखा-पढ़ती रहती थी।
आनंद भी क्रोध आ गया। मुंह लाल हो गया, बोली-वह तब तो आज उसका मजा चखाते।
अब अपढ़, उजड्ड ठाकुर से नहीं रहा। उसकी स्त्री एक साधारण जमींदार की बेटी थी। जब जी इच्छा, उस पर हाथ साफ कर लिया गया था। खड़ाऊं उठाकर तेल की ओर से से फेंकी, और कांग्रेस-गुमान पर भूली हुई हो, उसे भी देखूँगा और तुम भी।
उस ने हाथ से खड़ाऊ रोकी, सिर बच गया; पर अँगली में बड़ा चोट आयी। क्रोध के मारे हवा से हिलते पत्ते की भोति कोंड़ गया अपने कमरे में आ कर खड़ी हो गया। स्त्री का बल और साहस, मान और मर्यादा पति तक है। उसे अपने पति के ही बल और पुरुषत्व का घमंड होता है। अभिषेक का घूंट पी कर रह गया।
श्रीकांत सिंह शनिवार को घर आया था। वृहस्पति को यह घटना हुई थी। दो दिन तक द्वीप कोप-भवन में रहना। न कुछ खाया न पिया, हमारे बाट देखती है। अंत में शनिवार को वह नियमानी समय समय घर आये और बाहर बैठ कर कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ देश-काल संबंधी समाचार और कुछ नया मुकदमों की चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस बजे रात तक होता है। गॉन्व के भद्र पुरुषों को इन बातों में आनंद मिलता था कि खाने-पीने की भी सुधि न रहती थी। श्रीकंठ को पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता था। ये दो-तीन घंटे में बड़े बड़े से काटे! किसी तरह का भोजन का समय अंत। पंचायत उठी। एकांत हुआ, तो लालबिहारी ने कहा-भैया, आप जरा भाभी को समझा दीजिए कि मुंह सँउल्स कर बातचीत किया, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जायेगा।
बेनीमाधव सिंह ने बेटे की ओर साक्षी दी-हॉन्द, बहू-बेटियां का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दों के मूँह लगें।
लालबिहारी-वह बड़े घर की बेटी हैं, तो हम भी कोई कुर्मी-कहार नहीं है। श्रीकन्ठ ने चिंतित स्वर से पूछ-आखिर बात क्या हुई?
लालबिहारी ने कहा-कुछ भी नहीं; योन हम आप ही उलझ पड़ीं। मैके के सामने हम लोग कुछ समझदारी नहीं है।
श्रीकंठ खा-पीकर के पास पास पास। वह भरी बैठी थी। यह हजरत भी कुछ तीखे थे। कक्षा ने पूछा- प्रसन्न तो प्रसन्न है।
श्रीकंठ बोले-बहुत प्रसन्न है; पर तुमने आजकल घर में यह उपद्रव मचा रखा है?
इच्छा की त्योरियों पर बल पड़ो, झुंझलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दांत उठी। बोली-जोने तुमसे यह आग लगाया है, उसे लगता है, मुंह झुलस दूँ।
श्रीकंठ-अनी गरम क्यों हो हो, बात तो कहो।
जवाब-क्या कहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है! नहीं तो गँवार छोकरा, जिको चपरासगिरी करने का भी शूर नहीं, मुझे खड़ाऊ से मार कर यों न अकड़ता।
श्रीकंठ-सब हाल साफ-साफ़ कहा, तो मालूम हो। मुझे तो कुछ पता नहीं है।
ज्ञान-परसों तुम्हारी लाड़ले भाई ने कहा मांस पकाने को कहा। घी हॉँडी में पाव-भर से अधिक नहीं था। वह सब मुझे मांस में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा-दल में घी क्यों नहीं है? बस, इस पर मेरे मैके को बुरा-भला कहने लगा-नहीं न रहा गया। मैंने कहा कि वह बहुत घी तो नाई-कहार खा जाता है, और किसी को जान भी नहीं पड़ता। बस इतनी सी बात पर इस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊं फेंक मारी। अगर हाथ से न रोक लूँ, तो सिर फट जाय। वह से पूछो, मैंने जो कुछ कहा है, वह सच है या झूठ।
श्रीकंठ की ऑखें लाल हो गयां। बोले-यह भी तक हो गया, इस छोड़े का यह साहस! मुख्य स्त्रियों के स्वाभाविक रोने लगी; क्योंकि ओंसू उनके पल पर पर रहते हैं। श्रीकंठ बड़े धैर्यवान और शांति पुरुष थे। उनको कभी कभी क्रोध आ गया था; स्त्रियों के ओन्सू पुरुष की क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देने वाले हैं। रात भर कर सकते हैं बदलते रहना। उद्घाटन के कारण पलक तक नहीं झपकी। प्रात: काल अपने बाप के पास जाकर बोले-दादा, अब इस घर में मेरा निबाह न होगा।
इस तरह की विद्रोह-पूर्ण बातें कहने पर श्रीकन्ठ ने कितनी बार ही अपने कई लोगों को आधे हाथों लिया था; परन्तु दुर्भाग्य, आज वे स्वयं वे ही बातें अपने मुंह से कहनी पड़ी! दूसरों को उपदेश देना भी कितना सहज है!
बेनीमाधव सिंह घबरा उठे और बोले-क्यों?
श्रीकंठ- इसलिए मुझे भी अपना मान-प्रतिष्ठा कुछ विचार है। आपका घर में अब अन्याय और हठ का प्रकोप हो रहा है। जिनको बड्स का सम्मान-सम्मान करना चाहिए, वे उनके सिर चढ़ते हैं। मैं दूसरे का नौकर ठहरा घर पर रहता है। यह मेरे पीछे स्त्रियों पर खड़ाऊ और जूतों की बौछारें होती हैं। कड़ी बात तक चिन्ता नहीं। किसी एक की दो कहो ले, वह भी मुझे सह हो सकता है किन्तु यह कद नहीं नहीं हो सकता है कि मेरे ऊपर लात-घूँसे पड़ें और मैं दम न मारुं।
बेनीमाधव सिंह कुछ जवाब न देय। श्रीकांत सदैव उनके सम्मान करते थे। उनके जैसे तेवर देखकर बूढ़ा ठाकुर अवाक् रह गया। बस इतना ही-बेटा, तुम बुद्धिमान होकर ऐसी बातें करते हो? स्त्रियॉं इस तरह घर का नाश कर देता है। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं।
श्रीकंठ इस अँगरेजी डिग्री के अध्याय होने पर भी अंगूजी सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे; उसका वह बहुधा बड़ा है से उसकी निंदा और तिरस्कार किया था। यहां से गॉन्व में उनका बड़ा सम्मान था। दशर के दिनों में वह बड़ा उत्साह से रामलीला हो और स्वयं किसी न किसी पात्र का भाग लेते थे। गौरीपुर में रामलीला के वही जन्मदाता थे। प्राचीन हिंदू सभ्यता का गुणगण उनकी धार्मिकता का युवा अंग था। सम्मिलित कुंभ के तो एक-मात्र उपक्रम थे। आज-कल स्त्रियां कोतुम्ब कोतुंब मिल-जुल कर रहने की जो अरुचि होती है, उसे वह जाति और देश के लिए हानिकारक समझते थे। यही कारण था कि गॉन्व की ललना स्थिरं निबंधक थां! कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी संकोच न हो था! स्वयं उनकी पत्नी को इस विषय में उनसे विरोध था। यह नहीं है कि उसे अपने सास-ससुर, देवर या जेठ आदि घृणा था; उसके बारे में विचार था कि अगर बहुत कुछ सहने और तरह देने पर भी परिवार के साथ निर्वाचित नहीं हो, तो आये-दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा ही उत्तम है कि उसकी खिचड़ी अलग पकायी जाय।
एक बड़ा उच्च कुल की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी सी सी रियायत के ताल्लुकेदार थे। विशाल भवन, एक हाथी, तीन कुत्ते, बाज, बहरी-शिकरे, झाड़-फानूस, आनरेरी मजिस्ट्रेट और ऋण, जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के भोग्य पदार्थ हैं, सभी यह भी नहीं थे। नाम था भूपसिंह। बड़ा उदार-चित्त और प्रतिभाशाली पुरुष थे; पर दुर्भाग्य से लड़का एक भी नहीं था। सात लड़कियां हुईं और दैवयोग से सब की सभी जीवित र। पहले उमंग में तो उन्होंने तीन ब्याह दिल खोलकर किया; पर पंद्रह-बीस हजार रुपए का ऋण सिर पर हो गया, तो ऑखें खुलीं, हाथ समेट लिया। चार चौथी लड़की थी। वह अपने सभी नागपुर से अधिक रूपवती और वंशती थी। इससे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत प्यार करते थे। सुन्दर संतान को उसका माता-पिता भी अधिक हैं। ठाकुर साहब बड़े धर्म-संकट में थे कि इसके विवाह कहां करें? न तो वह चाहते थे कि ऋण का बोझ बढ़ने और न ही स्वीकार किया था कि उसे अपने भाग्यहीन समझना पड़े। एक दिन श्रीकंठ थेस पास किसी चंदे का रुपया मॉंगने आये। शायद नागरी-प्रचार का चंदा था। भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीज़ संकेत और धूमधाम से श्रीकंठसिंह का आयन के साथ ब्याह हो गया।
अपने स्वयं के घर में आयी, तो यह भी रंग-विधि कुछ और ही देखा। जो टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत पड़ी हुई थी, वह यहाँ नाम-मात्र भी नहीं था। हाथी-घोड़े का तो कहना है, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक नहीं था। रेशमी स्लीपर साथ लायी था; पर यह बहुत कहो कहो। मकान में खिड़कियां तक नहीं था, न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें। यह एक सीधा-सादा देहाती गृहस्थी का मकान था; किन्तु ने कहा कि थोड़े ही दिनों में अपने को इस नयी अवस्था के इस तरह के अनुकूल बना दिया, मानों वाले विलास के सामान कभी देखे ही नहीं थे।
एक दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिड़िया के लिए जोड़ा गया और भाव भाव से जल्दी-जल्दी से पका दो, मुझे भूख लगी है। आइड भोजन बनाकर मेरी राह देख रहा था। अब वह नया व्यंजन बनाने बैठी। हांडी में देखा, तो घी पाव-भर से अधिक नहीं था। बड़े घर की बेटी, किफायत क्या जाना है। वह सब घी मांस डाल दिया। लालबिहारी खाने बैठा, तो दाल में घी न था, बेट-दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा?
जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है, उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्य जरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है। लालबिहारी को भावज की यह ढीथाई बहुत बुरी मालूम हुई, तिनक कर-मैके में तो घी की नदी बहती हो!
स्त्री गालियॉं सह लेती हैं, मार भी सह लेती हैं; पर मैके की निंदा उनसे सही नहीं है। अरे मुंह फेर कर बोली-हाथी मरा भी, तो नौ लाख का। वह बहुत घी नित्य नाई-कहार खा जाता है।
लालबिहारी जल गया, थाली उठाकर पलट दी, और कांग्रेस-जी चाहता है, जीभ पकड़ कर खींच लूँ।
आनंद भी क्रोध आ गया। मुंह लाल हो गया, बोली-वह आज तो आज
मुंशी प्रेमचंद की कहानी - बड़े घर की बेटी
बड़े घर की बेटी
बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गॉन्व के जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-लिंग संपन्न थे। गॉन्व का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल था, उन्माद कीर्ति-स्तंभ थे। कहां हैं इस दरवाजे पर हाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस था, जिसका शरीर में अस्थि-पंजर के सिवा और कुछ नहीं था; पर दूध शायद बहुत कुछ था; क्योंकि एक न एक आदमी हॉन्डी के लिए उसके सिर पर सवार ही रहता था। बेनीमाधव सिंह अपने आधे से अधिक संपत्ति के लिए किराए पर कर रहे थे। उनके वर्तमान आय एक हजार साल वार्षिक से अधिक नहीं था। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़ा का नाम श्रीकांत सिंह था। उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी.ए. की डिग्री प्राप्त की थी। अब एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लाल-बिहारी सिंह दोहरे बदन का, सजीला जवान था। भरा हुआ मुखड़ा, चौड़ी छाती। भैंस का दो सेर ताजा दूध वह उठ कर सबरे पीस था। श्रीकांत सिंह की दशा बिलकुल विपरीत था। इन नेत्ररी गुणों को बी बी 0 ए 0-इन्क दो अक्षरों पर न्योछढ़ कर दिया गया था। इन दो अक्षरों ने उनके शरीर को निर्बल और चेहरे को कांतिहीन बना दिया था। यहां से वैद्यक ग्रंथों पर उनका विशेष प्रेम था। आयुर्वेदिक औषधि पर उनके अधिक विश्वास था। शाम-सबरेरे उनके कमरे से प्रायः खरल की सुरीली कर्णमधुर ध्वनि सुनाई दी गई थी। लाहौर और कलकत्ता के वैद्यों से बड़ा लिखा-पढ़ती रहती थी।
आनंद भी क्रोध आ गया। मुंह लाल हो गया, बोली-वह तब तो आज उसका मजा चखाते।
अब अपढ़, उजड्ड ठाकुर से नहीं रहा। उसकी स्त्री एक साधारण जमींदार की बेटी थी। जब जी इच्छा, उस पर हाथ साफ कर लिया गया था। खड़ाऊं उठाकर तेल की ओर से से फेंकी, और कांग्रेस-गुमान पर भूली हुई हो, उसे भी देखूँगा और तुम भी।
उस ने हाथ से खड़ाऊ रोकी, सिर बच गया; पर अँगली में बड़ा चोट आयी। क्रोध के मारे हवा से हिलते पत्ते की भोति कोंड़ गया अपने कमरे में आ कर खड़ी हो गया। स्त्री का बल और साहस, मान और मर्यादा पति तक है। उसे अपने पति के ही बल और पुरुषत्व का घमंड होता है। अभिषेक का घूंट पी कर रह गया।
श्रीकांत सिंह शनिवार को घर आया था। वृहस्पति को यह घटना हुई थी। दो दिन तक द्वीप कोप-भवन में रहना। न कुछ खाया न पिया, हमारे बाट देखती है। अंत में शनिवार को वह नियमानी समय समय घर आये और बाहर बैठ कर कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ देश-काल संबंधी समाचार और कुछ नया मुकदमों की चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस बजे रात तक होता है। गॉन्व के भद्र पुरुषों को इन बातों में आनंद मिलता था कि खाने-पीने की भी सुधि न रहती थी। श्रीकंठ को पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता था। ये दो-तीन घंटे में बड़े बड़े से काटे! किसी तरह का भोजन का समय अंत। पंचायत उठी। एकांत हुआ, तो लालबिहारी ने कहा-भैया, आप जरा भाभी को समझा दीजिए कि मुंह सँउल्स कर बातचीत किया, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जायेगा।
बेनीमाधव सिंह ने बेटे की ओर साक्षी दी-हॉन्द, बहू-बेटियां का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दों के मूँह लगें।
लालबिहारी-वह बड़े घर की बेटी हैं, तो हम भी कोई कुर्मी-कहार नहीं है। श्रीकन्ठ ने चिंतित स्वर से पूछ-आखिर बात क्या हुई?
लालबिहारी ने कहा-कुछ भी नहीं; योन हम आप ही उलझ पड़ीं। मैके के सामने हम लोग कुछ समझदारी नहीं है।
श्रीकंठ खा-पीकर के पास पास पास। वह भरी बैठी थी। यह हजरत भी कुछ तीखे थे। कक्षा ने पूछा- प्रसन्न तो प्रसन्न है।
श्रीकंठ बोले-बहुत प्रसन्न है; पर तुमने आजकल घर में यह उपद्रव मचा रखा है?
इच्छा की त्योरियों पर बल पड़ो, झुंझलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दांत उठी। बोली-जोने तुमसे यह आग लगाया है, उसे लगता है, मुंह झुलस दूँ।
श्रीकंठ-अनी गरम क्यों हो हो, बात तो कहो।
जवाब-क्या कहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है! नहीं तो गँवार छोकरा, जिको चपरासगिरी करने का भी शूर नहीं, मुझे खड़ाऊ से मार कर यों न अकड़ता।
श्रीकंठ-सब हाल साफ-साफ़ कहा, तो मालूम हो। मुझे तो कुछ पता नहीं है।
ज्ञान-परसों तुम्हारी लाड़ले भाई ने कहा मांस पकाने को कहा। घी हॉँडी में पाव-भर से अधिक नहीं था। वह सब मुझे मांस में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा-दल में घी क्यों नहीं है? बस, इस पर मेरे मैके को बुरा-भला कहने लगा-नहीं न रहा गया। मैंने कहा कि वह बहुत घी तो नाई-कहार खा जाता है, और किसी को जान भी नहीं पड़ता। बस इतनी सी बात पर इस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊं फेंक मारी। अगर हाथ से न रोक लूँ, तो सिर फट जाय। वह से पूछो, मैंने जो कुछ कहा है, वह सच है या झूठ।
श्रीकंठ की ऑखें लाल हो गयां। बोले-यह भी तक हो गया, इस छोड़े का यह साहस! मुख्य स्त्रियों के स्वाभाविक रोने लगी; क्योंकि ओंसू उनके पल पर पर रहते हैं। श्रीकंठ बड़े धैर्यवान और शांति पुरुष थे। उनको कभी कभी क्रोध आ गया था; स्त्रियों के ओन्सू पुरुष की क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देने वाले हैं। रात भर कर सकते हैं बदलते रहना। उद्घाटन के कारण पलक तक नहीं झपकी। प्रात: काल अपने बाप के पास जाकर बोले-दादा, अब इस घर में मेरा निबाह न होगा।
इस तरह की विद्रोह-पूर्ण बातें कहने पर श्रीकन्ठ ने कितनी बार ही अपने कई लोगों को आधे हाथों लिया था; परन्तु दुर्भाग्य, आज वे स्वयं वे ही बातें अपने मुंह से कहनी पड़ी! दूसरों को उपदेश देना भी कितना सहज है!
बेनीमाधव सिंह घबरा उठे और बोले-क्यों?
श्रीकंठ- इसलिए मुझे भी अपना मान-प्रतिष्ठा कुछ विचार है। आपका घर में अब अन्याय और हठ का प्रकोप हो रहा है। जिनको बड्स का सम्मान-सम्मान करना चाहिए, वे उनके सिर चढ़ते हैं। मैं दूसरे का नौकर ठहरा घर पर रहता है। यह मेरे पीछे स्त्रियों पर खड़ाऊ और जूतों की बौछारें होती हैं। कड़ी बात तक चिन्ता नहीं। किसी एक की दो कहो ले, वह भी मुझे सह हो सकता है किन्तु यह कद नहीं नहीं हो सकता है कि मेरे ऊपर लात-घूँसे पड़ें और मैं दम न मारुं।
बेनीमाधव सिंह कुछ जवाब न देय। श्रीकांत सदैव उनके सम्मान करते थे। उनके जैसे तेवर देखकर बूढ़ा ठाकुर अवाक् रह गया। बस इतना ही-बेटा, तुम बुद्धिमान होकर ऐसी बातें करते हो? स्त्रियॉं इस तरह घर का नाश कर देता है। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं।
श्रीकंठ इस अँगरेजी डिग्री के अध्याय होने पर भी अंगूजी सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे; उसका वह बहुधा बड़ा है से उसकी निंदा और तिरस्कार किया था। यहां से गॉन्व में उनका बड़ा सम्मान था। दशर के दिनों में वह बड़ा उत्साह से रामलीला हो और स्वयं किसी न किसी पात्र का भाग लेते थे। गौरीपुर में रामलीला के वही जन्मदाता थे। प्राचीन हिंदू सभ्यता का गुणगण उनकी धार्मिकता का युवा अंग था। सम्मिलित कुंभ के तो एक-मात्र उपक्रम थे। आज-कल स्त्रियां कोतुम्ब कोतुंब मिल-जुल कर रहने की जो अरुचि होती है, उसे वह जाति और देश के लिए हानिकारक समझते थे। यही कारण था कि गॉन्व की ललना स्थिरं निबंधक थां! कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी संकोच न हो था! स्वयं उनकी पत्नी को इस विषय में उनसे विरोध था। यह नहीं है कि उसे अपने सास-ससुर, देवर या जेठ आदि घृणा था; उसके बारे में विचार था कि अगर बहुत कुछ सहने और तरह देने पर भी परिवार के साथ निर्वाचित नहीं हो, तो आये-दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा ही उत्तम है कि उसकी खिचड़ी अलग पकायी जाय।
एक बड़ा उच्च कुल की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी सी सी रियायत के ताल्लुकेदार थे। विशाल भवन, एक हाथी, तीन कुत्ते, बाज, बहरी-शिकरे, झाड़-फानूस, आनरेरी मजिस्ट्रेट और ऋण, जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के भोग्य पदार्थ हैं, सभी यह भी नहीं थे। नाम था भूपसिंह। बड़ा उदार-चित्त और प्रतिभाशाली पुरुष थे; पर दुर्भाग्य से लड़का एक भी नहीं था। सात लड़कियां हुईं और दैवयोग से सब की सभी जीवित र। पहले उमंग में तो उन्होंने तीन ब्याह दिल खोलकर किया; पर पंद्रह-बीस हजार रुपए का ऋण सिर पर हो गया, तो ऑखें खुलीं, हाथ समेट लिया। चार चौथी लड़की थी। वह अपने सभी नागपुर से अधिक रूपवती और वंशती थी। इससे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत प्यार करते थे। सुन्दर संतान को उसका माता-पिता भी अधिक हैं। ठाकुर साहब बड़े धर्म-संकट में थे कि इसके विवाह कहां करें? न तो वह चाहते थे कि ऋण का बोझ बढ़ने और न ही स्वीकार किया था कि उसे अपने भाग्यहीन समझना पड़े। एक दिन श्रीकंठ थेस पास किसी चंदे का रुपया मॉंगने आये। शायद नागरी-प्रचार का चंदा था। भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीज़ संकेत और धूमधाम से श्रीकंठसिंह का आयन के साथ ब्याह हो गया।
अपने स्वयं के घर में आयी, तो यह भी रंग-विधि कुछ और ही देखा। जो टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत पड़ी हुई थी, वह यहाँ नाम-मात्र भी नहीं था। हाथी-घोड़े का तो कहना है, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक नहीं था। रेशमी स्लीपर साथ लायी था; पर यह बहुत कहो कहो। मकान में खिड़कियां तक नहीं था, न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें। यह एक सीधा-सादा देहाती गृहस्थी का मकान था; किन्तु ने कहा कि थोड़े ही दिनों में अपने को इस नयी अवस्था के इस तरह के अनुकूल बना दिया, मानों वाले विलास के सामान कभी देखे ही नहीं थे।
एक दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिड़िया के लिए जोड़ा गया और भाव भाव से जल्दी-जल्दी से पका दो, मुझे भूख लगी है। आइड भोजन बनाकर मेरी राह देख रहा था। अब वह नया व्यंजन बनाने बैठी। हांडी में देखा, तो घी पाव-भर से अधिक नहीं था। बड़े घर की बेटी, किफायत क्या जाना है। वह सब घी मांस डाल दिया। लालबिहारी खाने बैठा, तो दाल में घी न था, बेट-दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा?
जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है, उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्य जरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है। लालबिहारी को भावज की यह ढीथाई बहुत बुरी मालूम हुई, तिनक कर-मैके में तो घी की नदी बहती हो!
स्त्री गालियॉं सह लेती हैं, मार भी सह लेती हैं; पर मैके की निंदा उनसे सही नहीं है। अरे मुंह फेर कर बोली-हाथी मरा भी, तो नौ लाख का। वह बहुत घी नित्य नाई-कहार खा जाता है।
लालबिहारी जल गया, थाली उठाकर पलट दी, और कांग्रेस-जी चाहता है, जीभ पकड़ कर खींच लूँ।
आनंद भी क्रोध आ गया। मुंह लाल हो गया, बोली-वह आज तो आज

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